Sunday, June 14, 2026


बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


अर्कान -
 
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल

वज़्न

  122 122 122 12

बह्र- बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर

अर्कान - फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल

वज़्न - 122 122 122 12

काफ़िया: होने (ओने स्वर की बंदिश)
रदीफ़: लगा

☘️

शमा क्या जली शोर होने लगा,

कही नज्म थी कोई रोने लगा।

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न चाहा कभी दिल दुखे प्यार में,
मगर वक्त सपनें पिरोने लगा।
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लगे प्यार में बेवजह जो कभी,
वही इश्क के दाग धोने लगा।
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गमों से भरी रात थी वो खड़ी,
सितारे सहित चाँद खोने लगा।
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विवशता बड़ी छोड़ जाना उसे,
विरह में सभी दर्द ढोने लगा।
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तमाशा बना आशिकी का सुनो,
कफ़न आँसुओ से भिगोने लगा।
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कहाँ कौन "अविराज" तेरी सुने,
समय शूल सबको चुभोने लगा।
☘️✍️
अरविन्द चास्टा "अविराज "
कपासन चित्तौड़गढ़ राज।


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