बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
अर्कान -
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
वज़्न
122 122 122 12
बह्र- बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
अर्कान - फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
वज़्न - 122 122 122 12
काफ़िया: होने (ओने स्वर की बंदिश)
रदीफ़: लगा
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शमा क्या जली शोर होने लगा,
कही नज्म थी कोई रोने लगा।
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न चाहा कभी दिल दुखे प्यार में,
मगर वक्त सपनें पिरोने लगा।
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लगे प्यार में बेवजह जो कभी,
वही इश्क के दाग धोने लगा।
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गमों से भरी रात थी वो खड़ी,
सितारे सहित चाँद खोने लगा।
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विवशता बड़ी छोड़ जाना उसे,
विरह में सभी दर्द ढोने लगा।
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तमाशा बना आशिकी का सुनो,
कफ़न आँसुओ से भिगोने लगा।
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कहाँ कौन "अविराज" तेरी सुने,
समय शूल सबको चुभोने लगा।
☘️✍️
अरविन्द चास्टा "अविराज "
कपासन चित्तौड़गढ़ राज।
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