बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मिन सालिम
अरकान :
फ़ाइलुन , फ़ाइलुन , फ़ाइलुन , फ़ाइलुन
वज़्न :
212 - 212 - 212 - 212
इसी बहर में चन्द फ़िल्मी नग़मात के मुखड़ों के बोल
01- ज़िन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र
02 - हर हसीं चीज़ का मैं तलबगार हूँ
03 - हर तरफ़ हर जगह बे शुमार आदमी
04 -कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियो
05 ख़ुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी
06 आप की याद आती रही रात भर
07 गीत गाता हूँ मैं गुनगुनाता हूँ मैं
08 बे ख़ुदी में सनम उठ गए जो क़दम
09 एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
ग़ज़ल
🌹
आज कुछ भी सुनाना नही चाहता।
दर्द दिल का बताना नहीं चाहता।
🌹
खो गई है मेरी आशिकी ही कहाँ।
वाद कोई लिखाना नहीं चाहता
🌹
आज साकी पिला दे मुझे इस कदर।
होश में दिल लगाना नहीं चाहता
🌹
वो शमा ही बुझा दी गमे इश्क में।
इस निशा मैं उजाला नहीं चाहता।
🌹
तुम मेरी थी हमेशां रहोगी मेरी
प्यार फिर से जताना नहीं चाहता।
🌹
साथ जितना रहा बन्दगी हो गई।
ख्वाब दूजा सजाना नहीं चाहता।
🌹
जानता हूँ सदा बेबसी को तेरी।
महफ़िलो में बुलाना नहीं चाहता।
🌹
चन्द दिन ही हुये हम मिले थे जहाँ।
वक्त वो दोहराना नहीं चाहता
🌹
बस यही राज अविराज जाहिर न हो।
नाम तेरा बताना नहीं चाहता।
🌹✍
अरविन्द चास्टा अविराज
🌹
आज कुछ भी सुनाना नही चाहता।
दर्द दिल का बताना नहीं चाहता।
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खो गई है मेरी आशिकी ही कहाँ।
वाद कोई लिखाना नहीं चाहता
🌹
आज साकी पिला दे मुझे इस कदर।
होश में दिल लगाना नहीं चाहता
🌹
वो शमा ही बुझा दी गमे इश्क में।
इस निशा मैं उजाला नहीं चाहता।
🌹
तुम मेरी थी हमेशां रहोगी मेरी
प्यार फिर से जताना नहीं चाहता।
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साथ जितना रहा बन्दगी हो गई।
ख्वाब दूजा सजाना नहीं चाहता।
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जानता हूँ सदा बेबसी को तेरी।
महफ़िलो में बुलाना नहीं चाहता।
🌹
चन्द दिन ही हुये हम मिले थे जहाँ।
वक्त वो दोहराना नहीं चाहता
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बस यही राज अविराज जाहिर न हो।
नाम तेरा बताना नहीं चाहता।
🌹✍
अरविन्द चास्टा अविराज
कपासन ,चित्तौरगढ़ ,राज.
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